किसी भी कार की असली पहचान शोरूम में नहीं होती, बल्कि हजारों किलोमीटर के लंबे सफर में होती है। जब लगातार कई दिनों तक हाईवे, पहाड़, टूटी सड़कें, बदलता मौसम और घंटों की ड्राइविंग एक साथ मिलती है, तभी पता चलता है कि कार सिर्फ दिखने में अच्छी है या वास्तव में भरोसेमंद भी।
मेरे लिए दिल्ली से लेह (Delhi to Leh) तक का यह रोड ट्रिप बिल्कुल ऐसा ही अनुभव रहा। इस सफर के दौरान मेरी Tata Nexon Diesel ने कुल 2,458 किलोमीटर की दूरी तय की। लगभग 67 घंटे स्टीयरिंग के पीछे बिताने के बाद ट्रिप खत्म हुई और पूरे सफर का औसत माइलेज करीब 19.7 किमी/लीटर रहा।
सच कहूँ तो पहाड़ों, ट्रैफिक और ऊँचाई वाले रास्तों को देखते हुए मुझे खुद इतनी अच्छी फ्यूल एफिशिएंसी की उम्मीद नहीं थी। लेकिन इस सफर ने सिर्फ माइलेज ही नहीं, बल्कि नेक्सॉन की असली ताकत और कमजोरियों दोनों को खुलकर सामने रख दिया।
क्विक ओनरशिप स्नैपशॉट (Quick Snapshot)

- कार मॉडल: टाटा नेक्सॉन डीजल (Tata Nexon Diesel)
- कार ओनर: संदीप कुमार (दिल्ली)
- कुल दूरी: 2,458 किमी
- कुल ड्राइविंग समय: लगभग 67 घंटे
- औसत माइलेज: 19.7 किमी/लीटर
दिल्ली से चंडीगढ़: सफर की आरामदायक शुरुआत
सुबह जल्दी दिल्ली से निकलने का फैसला बिल्कुल सही साबित हुआ। जैसे-जैसे ट्रैफिक कम होता गया, नेक्सॉन का हाईवे कैरेक्टर समझ आने लगा।
100 से 110 किमी/घंटा की स्पीड पर कार बेहद स्थिर महसूस हुई। इसकी शानदार हाईवे स्टेबिलिटी (Stability) की वजह से बार-बार स्टीयरिंग को करेक्ट करने की जरूरत नहीं पड़ी और लंबी सीधी सड़क पर ड्राइविंग काफी रिलैक्सिंग लगी।
कुछ घंटे लगातार ड्राइव करने के बाद जब चंडीगढ़ पहुँचा, तब महसूस हुआ कि उम्मीद से काफी कम थकान हुई थी। किसी लॉन्ग-डिस्टेंस टूरिंग कार के लिए यही सबसे बड़ा पॉजिटिव पॉइंट माना जाता है।
चंडीगढ़ से मनाली: यहीं से ड्राइविंग का असली मज़ा शुरू हुआ
मैदानी इलाकों को पीछे छोड़ते ही सड़क का स्वभाव पूरी तरह बदल गया। कुल्लू घाटी के घुमावदार रास्ते, ब्यास नदी के किनारे बनी सड़कें और लगातार आते ब्लाइंड कर्व्स ड्राइविंग को और दिलचस्प बना रहे थे।
ऐसे रास्तों पर नेक्सॉन की हाई सीटिंग पोजीशन काफी काम आई। विजिबिलिटी अच्छी होने की वजह से आगे का ट्रैफिक समझना आसान था और तंग मोड़ों पर भी कार ने पूरा आत्मविश्वास दिया। गाड़ी का बैलेंस (Balance) हर मोड़ पर कमाल का महसूस हो रहा था।
रोहतांग पास के बाद समझ आया सस्पेंशन कितना मजबूत है

रोहतांग के आसपास कई जगह सड़कें काफी खराब मिलीं। कहीं बड़े गड्ढे थे तो कहीं पत्थरों से भरे रफ सेक्शन। कई बार स्पीड घटाकर 20-30 किमी/घंटा करनी पड़ी, लेकिन इसके बावजूद कार के केबिन में अनावश्यक झटके या खड़खड़ाहट महसूस नहीं हुई।
यही वह जगह थी जहाँ नेक्सॉन का सस्पेंशन सबसे ज़्यादा प्रभावित करता है। लगातार खराब रास्तों पर चलने के बाद भी कार का संतुलन बना रहा और पीछे बैठे यात्रियों ने भी किसी तरह की असुविधा महसूस नहीं की।
Autobaba Observation: 67 घंटे की ड्राइविंग के बाद मेरी सबसे बड़ी सीख यही रही कि नेक्सॉन की सबसे कम चर्चा होने वाली खूबियों में इसका सस्पेंशन सेटअप जरूर शामिल होना चाहिए, और हो भी क्यों न—आखिरकार यह टाटा (Tata) का प्रोडक्ट जो है!
बारालाचा ला और सरचू: ऊँचाई पर इंजन ने कितना साथ दिया?

ऊँचाई बढ़ने के साथ हवा में ऑक्सीजन कम होना सामान्य बात है और इसका असर हर इंजन पर पड़ता है। इसके बावजूद सरचू और बारालाचा ला की खड़ी चढ़ाइयों पर नेक्सॉन डीजल ने कभी कमजोर या अंडरपावर्ड महसूस नहीं कराया।
इस ऊंचाई पर हवा का दबाव कम होने के कारण टर्बोचार्जर को थोड़ा ज़्यादा काम करना पड़ता है, लेकिन इसके बावजूद ओवरटेकिंग के समय पावर डिलीवरी लगातार और बिल्कुल प्रेडिक्टेबल बनी रही। बीच-बीच में BRO के रोड वर्क और ट्रैफिक की वजह से रुकना जरूर पड़ा, लेकिन कार के प्रदर्शन में कोई कमी महसूस नहीं हुई।
मोरे प्लेन्स: खुली सड़क और शानदार हाईवे स्टेबिलिटी
मोरे प्लेन्स इस पूरे सफर का सबसे खूबसूरत हिस्सा था। दूर-दूर तक सीधी सड़क, चारों तरफ पहाड़ और बेहद कम ट्रैफिक।
ऐसी जगहों पर नेक्सॉन की हाईवे स्टेबिलिटी देखने लायक थी। कार पूरी तरह सड़क से जुड़ी (planted) हुई महसूस होती रही और लंबी दूरी तय करना बिल्कुल भी थकाने वाला नहीं लगा। इसी दौरान खुले हाईवेज पर माइलेज कई बार 22 किमी/लीटर के आसपास भी पहुँचा, जो मेरे लिए किसी बोनस से कम नहीं था।
केबिन कम्फर्ट: 67 घंटे की ड्राइव के बाद भी थकान क्यों नहीं हुई?

किसी भी लॉन्ग रोड ट्रिप में इंजन या माइलेज से ज़्यादा फर्क इस बात से पड़ता है कि कई घंटे लगातार ड्राइव करने के बाद आपका शरीर कैसा महसूस करता है। इस मामले में नेक्सॉन ने मुझे बिल्कुल निराश नहीं किया:
- ड्राइवर सीट: कई बार लगातार 6-7 घंटे तक ड्राइव करनी पड़ी, लेकिन सीट का अंडर-थाई सपोर्ट और ड्राइविंग पोजीशन इतनी अच्छी रही कि पीठ या पैरों में ज्यादा दर्द महसूस नहीं हुआ।
- पीछे की सीट: पीछे बैठे यात्रियों ने भी पूरे सफर में लेगरूम और सीट कम्फर्ट को लेकर कोई शिकायत नहीं की।
- बूट स्पेस: तीन लोगों का भारी सामान आराम से फिट हो गया। बैग्स एडजस्ट करने के लिए अलग से कोई जुगाड़ नहीं करना पड़ा।
- एसी परफॉर्मेंस: दिल्ली की तेज़ झुलसाने वाली गर्मी से लेकर लेह की ठंडी हवा तक, ऑटोमैटिक क्लाइमेट कंट्रोल ने केबिन का तापमान लगातार आरामदायक बनाए रखा।
वो फीचर्स जिन्होंने सफर को बेहद आसान बनाया
1. 208 मिमी ग्राउंड क्लीयरेंस का असली फायदा
लेह रूट पर कई जगह ऐसे सेक्शन मिले जहाँ छोटे-बड़े पत्थर, उबड़-खाबड़ रास्ते और पानी के गहरे नाले (Water Crossings) पार करने पड़े। ऐसी जगहों पर 208 मिमी का ग्राउंड क्लीयरेंस वरदान साबित हुआ। कार के नीचे से टकराने का कोई डर नहीं रहा।
2. हिल होल्ड और ब्रेकिंग का कॉन्फिडेंस
पहाड़ों में बार-बार रुकना और फिर चढ़ाई पर दोबारा चलना पड़ता है। ऐसे समय हिल होल्ड कंट्रोल ने ड्राइविंग को बहुत आसान बना दिया; कार पीछे नहीं लुढ़की। लंबे डाउनहिल सेक्शन में भी ब्रेक्स हमेशा प्रेडिक्टेबल लगे और ‘ब्रेक फेड’ (ब्रेक गर्म होकर कम काम करना) जैसी कोई समस्या नहीं आई।
3. टायर अपग्रेड: Continental UltraContact UC6 का दम
फैक्ट्री वाले टायर्स घिसने के बाद मैंने इसमें Continental UC6 डलवाए थे। अब तक ये टायर्स लगभग 43,000 किमी चल चुके हैं और इनकी ग्रिप और केबिन कम्फर्ट लाजवाब है। हालांकि इनका कंपाउंड थोड़ा सॉफ्ट है, तो रफ पत्थरों पर थोड़े अतिरिक्त ध्यान की जरूरत रहती है, लेकिन ओवरऑल परफॉर्मेंस काबिले-तारीफ है।
खूबियाँ और कमियाँ (Pros & Cons)
जो बातें सबसे अच्छी लगीं (Pros):

- शानदार हाईवे स्टेबिलिटी: हाई-स्पीड पर कार बेहतरीन तरीके से सड़क से चिपक कर चलती है।
- कम्फर्टेबल सस्पेंशन: उबड़-खाबड़ रास्तों और गड्ढों को आसानी से सोखने वाला सस्पेंशन सेटअप।
- लाजवाब माइलेज: इतने मुश्किल पहाड़ी रास्तों के बाद भी 19.7 किमी/लीटर का एवरेज हैरान करने वाला है।
- ग्राउंड क्लीयरेंस: 208 मिमी का ग्राउंड क्लीयरेंस खराब रास्तों पर बेहतरीन काम करता है।
- सीट कम्फर्ट: बेहतरीन कुशनिंग लंबी जर्नी में भी शरीर को थकान से बचाए रखती है।
- सुरक्षित ब्रेकिंग: ढलान और मुश्किल मोड़ों पर मिलने वाली प्रेडिक्टेबल ब्रेकिंग परफॉर्मेंस।
जहाँ थोड़ा सुधार हो सकता था (Cons):
- इंफोटेनमेंट ग्लिचेस: टचस्क्रीन सिस्टम का रिस्पॉन्स थोड़ा और ज्यादा फास्ट और रिस्पॉन्सिव हो सकता था।
- पियानो ब्लैक पैनल्स: केबिन के ग्लॉसी ब्लैक पार्ट्स पर स्क्रैचेस और धूल बहुत जल्दी दिखाई देते हैं।
- टायर नॉइज़: 100 किमी/घंटा की रफ्तार पार करने के बाद टायर और विंड की आवाज़ केबिन में थोड़ी नोटिसेबल हो जाती है।
अंतिम फैसला (Autobaba Verdict)
| पैरामीटर | रेटिंग (आउट ऑफ 10) |
| हाईवे परफॉर्मेंस | 9 / 10 |
| राइड कम्फर्ट | 9 / 10 |
| माइलेज (डीजल) | 9.5 / 10 |
| खराब रास्तों पर प्रदर्शन | 8.5 / 10 |
| फीचर्स और टेक | 7.5 / 10 |
| OVERALL SCORE | 8.8 / 10 |
अंतिम राय
दिल्ली से लेह तक का यह 2,458 किलोमीटर का सफर सिर्फ एक रोड ट्रिप नहीं था, बल्कि नेक्सॉन की असली परीक्षा भी था। इस यात्रा ने मुझे यह समझाया कि एक अच्छी टूरिंग कार सिर्फ तेज़ इंजन से नहीं बनती। मजबूत सस्पेंशन, आरामदायक सीटें, भरोसेमंद इंजन, अच्छा ग्राउंड क्लीयरेंस और लगातार साथ निभाने वाला व्यवहार—ये सभी चीज़ें मिलकर उसे लंबी यात्राओं के लिए खास बनाती हैं।
अगर आपका इस्तेमाल शहर के साथ-साथ लंबी रोड ट्रिप्स के लिए भी है, तो Tata Nexon Diesel आज भी एक बेहद मजबूत और व्यावहारिक विकल्प साबित होती है। इसकी कुछ छोटी कमियाँ ज़रूर हैं, लेकिन पूरे सफर को देखते हुए वे आपके अनुभव पर बिल्कुल असर नहीं डालतीं।
अगर मुझे दोबारा दिल्ली से लेह जाना पड़े, तो नेक्सॉन की चाबी उठाने में मुझे दोबारा सोचने की ज़रूरत नहीं होगी। आखिरकार:
“डेस्टिनेशन चाहे कितना भी दूर क्यों न हो, अगर साथ में टाटा नेक्सॉन हो, तो सफर थोड़ा और आसान लगने लगता है।”

अंकित मंजरिया एक ऑटोमोबाइल कंटेंट राइटर, SEO प्रोफेशनल और Autobaba के संस्थापक हैं। उन्हें कारों और मोटरसाइकिलों के वास्तविक ओनरशिप अनुभव, लॉन्ग-टर्म रिव्यू, माइलेज टेस्ट और खरीदारी गाइड लिखने का अनुभव है। उनका उद्देश्य सिर्फ स्पेसिफिकेशन बताना नहीं, बल्कि भारतीय खरीदारों को ऐसी जानकारी देना है जो वास्तविक ड्राइविंग, रोज़मर्रा के उपयोग और प्रैक्टिकल ओनरशिप पर आधारित हो। Autobaba पर प्रकाशित उनके लेख निष्पक्ष रिसर्च, विश्वसनीय स्रोतों और वास्तविक उपयोग के अनुभव को प्राथमिकता देते हैं, ताकि पाठकों को सही खरीदारी का निर्णय लेने में मदद मिल सके।